Hitendra singh | 6:40 PM | Be the first to comment!

स्वस्तिक का रहस्य जानिए…


॥ ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्ध-श्रवा-हा स्वस्ति न-ह पूषा विश्व-वेदा-हा। 
स्वस्ति न-ह ताक्षर्‌यो अरिष्ट-नेमि-हि स्वस्ति नो बृहस्पति-हि-दधातु
अर्थात : महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करो, विश्व के ज्ञानस्वरूप पूषादेव हमारा कल्याण करो। जिसका हथियार अटूट है ऐसे गरूड़ भगवान हमारा मंगल करो। बृहस्पति हमारा मंगल करो। 
स्वस्तिक का आविष्कार आर्यों ने किया और पूरे विश्‍व में यह फैल गया। आज स्वस्तिक का प्रत्येक धर्म और संस्कृति में अलग-अलग रूप में इस्तेमाल किया गया है। कुछ धर्म, संगठन और समाज ने स्वस्तिक को गलत अर्थ में लेकर उसका गलत जगहों पर इस्तेमाल किया है तो कुछ ने उसके सकारात्मक पहलू को समझा।
स्वस्तिक को भारत में ही नहीं, अपितु विश्व के अन्य कई देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है। जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्र, ब्रिटेन, अमेरिका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन किसी न किसी रूप में मिलता है।
Hitendra singh | 12:06 PM | Be the first to comment!
आरती पूजन का महत्त्व:

घर हो या मंदिर, भगवान की पूजा के बाद घड़ी, घंटा और शंख ध्वनि के साथ आरती की जाती है। बिना आरती के कोई भी पूजा अपूर्ण मानी जाती है। इसलिए पूजा शुरू करने से पहले लोग आरती की थाल सजाकर बैठते हैं। पूजा में आरती का इतना महत्व क्यों हैं इसका उत्तर स्कंद पुराण में मिलता है। इस पुराण में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं।
आरती का धार्मिक महत्व होने के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। याद कीजिए आरती की थाल में कौन कौन सी वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। आपके जेहन में रुई, घी, कपूर, फूल, चंदन जरूर आ गया होगा। रुई शुद्घ कपास होता है इसमें किसी प्रकार की मिलावट नहीं होती है। इसी प्रकार घी भी दूध का मूल तत्व होता है। कपूर और चंदन भी शुद्घ और सात्विक पदार्थ है।
जब रुई के साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा भाग जाती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगता है।
आरती में बजने वाले शंख और घड़ी-घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है उसके प्रति मन केन्द्रित होता है जिससे मन में चल रहे द्वंद का अंत होता है। हमारे शरीर में सोई आत्मा जागृत होती है जिससे मन और शरीर उर्जावान हो उठता है और महसूस होता है कि ईश्वर की कृपा मिल रही है.........
Hitendra singh | 12:03 PM | Be the first to comment!
तिलक..............

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक मनुष्य अपने धर्म को बड़े विस्वास एवं आस्था के साथ निभाता है| हिन्दू पूजा करते समय या कहीं जाते समय अवस्य तिलक लगता है| महिलाये भी सुहाग के प्रतीक चिन्ह हेतु तिलक लगाती है| महिलाये लाल तिलक ही लगाती है क्योकि पति जाते समय उस तिलक को देखकर जाता है, जो सूर्य की लालिमा का प्रतीक होता है,एवं तिलक को देखकर पति को ये प्रेरणा मिलती है कि आज का दिन सूर्य कि लालिमा जैसा (सुखमय) रहे| एवं हर मांगलिक कार्य,शादी-विवाह,धार्मिक आयोजन,सामाजिक आयोजन में व्यक्ति तिलक लगाकर जाता है|
किसी आयोजन में आने वाले व्यक्ति का स्वागत-सत्कार हम तिलक लगाकर ही करते है| विशेषकर शादी-विवाह में बहन-बेटी या सुहागन आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का स्वागत तिलक लगाकर करते हैं| विशेषकर मध्यप्रदेश में मालवा एवं निमाड़ में यह प्रथा आज भी है|
तिलक मस्तक पर दोनों भौंहों के बीच नासिका के ऊपर प्रारंभिक स्थल पर लगाए जाते हैं जो हमारे चिंतन-मनन का स्थान है| यह चेतन-अवचेतन अवस्था में भी जागृत एवं सक्रिय रहता है, इसे आज्ञा-चक्र भी कहते हैं। इसी चक्र के दाईं ओर अजिमा नाड़ी होती है तथा दूसरी ओर वर्णा नाड़ी है। इन दोनों के संगम बिंदु पर स्थित चक्र को निर्मल, विवेकशील, ऊर्जावान, जागृत तथा तनावमुक्त रखने हेतु ही तिलक लगाया जाता है।
इस बिंदु पर सौभाग्यसूचक द्रव्य जैसे चंदन, केशर, कुमकुम आदि का तिलक लगाने से सात्विक एवं तेजपूर्ण होकर आत्मविश्वास में अभूतपूर्ण वृद्धि होती है, मन में निर्मलता, शांति एवं संयम में वृद्धि होती है।
Hitendra singh | 12:00 PM | Be the first to comment!
                                                    Krishna Temple in Dwaraka :-

An important pilgrimage center for Hindus is Dwaraka, on the west coast of Gujarat. Every inch of the city is linked up with Lord Krishna and is the place where ruled his kingdom. 12 Jyotirlingas representing Lord Shiva which manifested in different parts of the country as one of these is located in Dwarka and is known as the Nageshwar Mahadev. The sanctum of the Dwarkadish temple and dates back to 2500 years is the Jagat Mandir or Nij Mandir has its own hall of audience and the roof of the hall is supported by 60 columns as the main temple rises five storeys high ansd there is also a conical spire. The spire is richly carved and rises to a height of 157 feet. Rukmini"s( Krishna's wife) temple is one of the most popular temples in Dwarka is that of considered an incarnation of Goddess Lakshmi, the goddess of wealth and beauty.
At the end of Pandava Arjuna 12 year pilgrimage of holy places of ancient India (Bharata Varsha) made a visit to Dwaraka.

Hitendra singh | 11:08 PM | Be the first to comment!

                              kedarnath  Temple

 is one of the holiest Hindu temples dedicated to the god Shiva and is located on the Garhwal Himalayan range near the Mandakini river in Kedarnath, Uttarakhand in India. Due to extreme weather conditions, the temple is open only between the end of April (Akshaya Tritriya) to Kartik Purnima (the autumn full moon, usually November) every year. During the winters, the vigrahas (deities) from Kedarnath temple are brought to Ukhimath and worshipped there for six months. Lord Shiva is worshipped as Kedarnath, the 'Lord of Kedar Khand', the historical name of the region.

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